Panola rajput panola chouhan rajput
पानोला राजपूत वंश Panola Rajput vansh
पानोला राजपूत , पानोला (पाणोला ) चौहान वंश की एक शाखा है जोकि पवैया चौहान से निकली है और बाद में चलकर यह पवैया चौहान से पालनपरा चौहान और पानोला चौहान हुए
चौहान - पवैया - पालनपरा और पानोला (पाणोला) चौहान हुए
वंश - अग्निवंश
वेद - सामवेद
वृक्ष - आशापाल
नदी - सरस्वती
पोलपात - द्सोदी
इष्टदेव - पातालेश्वर महादेव
कुलदेवी - आशापुरा | शाकंभरी
नगारा - रणजीत
निशान - पीला
झंडा - सूरज,चांद,कटारी,तलवार
शाखा - कोथुनी
पुरोहित - सनादय ( चंदोरिया)
भाट - ब्रह्मा भाट
धूणी - सांभर
भेरू - काला भैरव | हर्ष भैरव
गढ़ - पाटन,जूनागढ़ ,पवैया गढ़, पालनपरा
गुरु - वशिष्ठ
तीर्थ - भॄगु क्षेत्र
पक्षी - कपोत
ऋषि - शांडिल्य
नौबत - कालिका
पितृ - लोटजी
प्रणाम - जय माता दी,जय आशापुरी
याद्र गोत्र के चौहान शाखा जिनकी पानोला परिवार प्रथम खेड़ा गुजरात के अंदर गढ़ पाटन जूनागढ़ का निकास किया और वहां से उठकर गांव कंजावनी कुंडिया बसाया, और कंजावनी का कुंडिया से उठकर उत्तर का गांव का धार का खेड़ा से गांव सेमलिया का खेड़ा बसाया और सेमलिया का खेड़ा से उठकर एक भाई का वंश गांव तो मेवासा की बसीगत किया । और एक भाई का वंश उठकर गांव तो नामली की बासीगत किया। और एक भाई का वंश उठकर गांव खेड़ा नारायण बसाया। एक भाई का वंश तो बरवना ( बोरवाना), रानीगांव और शेरपुर की बसीगत किया।
माता जिनकी कुलदेवी : - नोमी (नवमी ) माता की प्रथम पूजा करते हैं और मातेश्वरी की प्रथम पूजा के अंदर ।
9 लोग,
9 सुपारी
9 इलायची
9 खारक
9 बादाम
9 सिंगाड़ा
मेहंदी , नाडा, पान ,सुपारी ,टिकी ,काजल ,कुमकुम (कंकू ) ,चांवल ,अगरबत्ती, कपूर, ध्वजा, नारियल, के साथ में माता नोमी ( नवमी ) पूजते ।
मातेश्वरी को नो नो (9.9) रोटी के खन भरते और ( नो कूट ) का हल्दी आटे का चौक बनाते और नो ,9 दीपक घी का आटे का बनाकर जलाते हैं। माता जिनकी ( गुप्त ) पूजते हे। परिवार के अलावा दूसरा कोई भी माताजी की ज्योत और निपड़ भी नहीं देखता ( नहीं देख सकता ) और मातेश्वरी की पाटली के अंदर सोहन से मातेश्वरी की पाटली बढ़ते हैं । माताजी को सोलह (16 ) सिंगार के साथ में पूजते हैं ।
भेरू जी का स्थान और पूजा :- वर्तमान में ग्राम सेमलिया ( नामली ) जिला रतलाम मध्य प्रदेश में ।
ग्राम सेमलिया में भेरुजी बावड़ी में विराजमान है। जिनका मुंह पूर्व दिशा में है। और ग्राम सेमलिया में ठाकुर साहब राठौर मंथन सिंह जी उनके छोटे भाई अजय पाल सिंह जी जिनके छोटे भाई भर्तन सिंह जी की बार में।
पानोला परिवार के लोग जोकि गुजरात में पवैया राजपूत और पालनपरा राजपूत के नाम से जाने जाते हैं और वही मध्य प्रदेश के अंदर पानोला के नाम से जाने जाते हैं। गुजरात में यहां आपको सभी जिलों तथा मुख्य पाटन और जूनागढ़ में निवास करते हैं वही यह जूनागढ़ से पलायन कर सिद्धापुर ( गुजरात) के पास में पालनपुर बसाया ।
पानोला राजपुत्र वंश परिवार की कुछ जरूरी प्रथा , श्राप ,सती प्रथा ,विधियां एवं परंपराएं ।
सती प्रथा : - सर्वप्रथम पानोला परिवार में सती प्रथा चली जिस कारण गई विधीया और श्राप उत्पन्न हुए ।
सती प्रथा : - सर्वप्रथम पानोला परिवार में सती प्रथा चली जिस कारण गई विधीया और श्राप उत्पन्न हुए ।
सती माता का श्राप - सती माता का पानोला राजपूत वंश को श्राप हे की पानोला वंश परिवार के लोग कचुमल रंग नही पहनते नही पहन सकते।
: पानोला वंश परिवार में लंबा बैंगन नहीं बोया जाता नही बोह सकते ।
: पानोला वंश परिवार में शांकल पाठ का झूला नही डालते।
: पानोला वंश परिवार के अंदर कड़ी पाठ का पाला नही डालते हे।
: पानोला वंश परिवार के अंदर काली कांच की चूड़ियां वगेरह नही पहनते हे।
प्रथा : पानोला वंश परिवार में अग्निदाह नही किया जाता पानोला राजपूत परिवार में मिट्टीदाह किया जाता है।
कारण : सनातन संस्कृति तथा सनातन धर्म के ग्रंथों तथा पुराणों एवं पूजा पाठ संस्कृति के आधार पर सनातन धर्म में यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसे सनातन धर्म के रीति-रिवाजों के अनुसार अग्निदाह दिया जाता है ।तथा अंतिम संस्कार किया जाता है और उसके शरीर को पंचतत्वों में विलीन कर दिया जाता है।
तथा सनातन धर्म के अंदर कई बार कुछ लोगों को अग्नि दान नहीं दिया जाता है और वह अपनी स्वेच्छा से धरती माता की गोद में समा कर अपना शरीर समाधि के तौर पर छोड़ कर अपनी आत्मा को परमात्मा से जोड़कर देवतुल्य एवं देवता समान उपाधि ग्रहण कर समाज में जीवित रह कर अपने भक्तों की परेशानियों का समाधान करते हैं जिन्हें लोग आज भी देवता के रूप में पूजते हैं तथा उनके मंदिर एवं ओटले बनाकर विराजमान करते हैं । एवं उनका पूजा-पाठ अपनी अपनी रीति रिवाजों एवं वीधीयो द्वारा करते हैं।
इसी प्रकार पानोला राजपूत वंश परिवार में सनातन धर्म संस्कृति के द्वारा अनीता दिया जाता परंतु कुछ अरसे से पहले वर्तमान से सात - आठ पीढ़ियां पूर्व पानोला वंश परिवार में (पीरा सिंह जी ) हुए जो की राजस्थान में स्थित रुणीजा धाम में विराजमान भगवान विष्णु के अवतार बाबा रामदेव जी के परम भक्त थे चौकी ग्राम सेमलिया में निवास करते थे जो हर साल बाबा रामदेव जी के दरबार में दरीखाने जाते थे यानी बाबा देव जी के दरबार में पैदल यात्रा करते हुए जाते थे बाबा के दर्शन करने। और बाबा रामदेवरा के लोगों ने ( पिरा सिंह जी ) महाराज के नाम से जानने लगे तथा उन्हें गुरु महाराज का दर्जा दिया। पीरा सिंह जी जोकी बाबा रामदेव जी महाराज के परम भक्त थे। और हर साल रामदेवरा दरी खाने जाते थे। और जब पीरा सिंह जी रामदेवरा पहुंची और बाबा के दर्शन कर लौटने लगे तभी उनकी मृत्यु हो गई और बाबा रामदेव जी महाराज ने अपने परम भक्त को अपने श्री चरणों में स्थान दे दिया और जब वहां की स्थानीय लोगों ने पीरा सिंह जी को मृत्य अवस्था में पाया तो वहा के लोगों ने रामदेवरा के अंदर पिरा सिंह जी पानोला को गुरु महाराज के दर्जे की वजह से वही पर समाधि दे दी चूंकि वहा के सभी लोग उन्हें जानते थे कि यह तो गुरु महाराज है जो कि हर साल बाबा के यहां दरी खाने आते हैं।
फिर बाद में पिरा सिंह जी के परिवार जोकि निवासी ग्राम सेमलिया के थे उन्हें सूचना पहुंचाई गई कि आपके पानोला वंश परिवार के गुरु महाराज पीरा सिंह जी पानोला का निधन हो गया हे ओर हमने उन्हें गुरु महाराज के दर्जे के हिसाब से यहां पर समाधि दे दी गई है। और पीरा सिंह जी पानोला परिवार के लोगो के सपने में आए और उन्होंने बताया की उन्हें समाधि दे दी गई है और वह झुझार हो गए हे। बाद में रामदेवरा में भी कई लोगो के सपने में आ कर उन्होंने पर्चा दिया उसके बाद परिवार के लोगो तथा स्थानीय गांव वालो की मदद से रामदेवरा के समीप पीरा सिंह जी महाराज के समाधि स्थल पर मंदिर का निर्माण कराया गया एवं रामदेवरा के समीप (पानोला) गांव की स्थापना की गई और उसी के साथ में वहां से पानोला वंश परिवार ने अग्निदाह बंद कर मिट्टीदाग की प्रथा का पालन किया ।
क्योंकि पुरातन काल में यह प्रथा थी की अगर परिवार में अगर किसी ने मिट्टी समाधि ली हे या फिर दी गई है तो परिवार के लोगो को भी समाधि दी जाती हे।
पुरातन काल के लोगो का मानना था की परिवार में किसी की भी समाधि के बाद अगर परिवार के किसी भी व्यक्ति का अग्निदाह किया जाता है तो उस अग्नि का ताप समाधि में विराजमान व्यक्ति को लगता है । जो की बहुत ही कष्ट आई होता था । इसीलिए पानोला राजपूत वंश परिवार ने अग्निदाह का पालन ना कर मिट्ठिदाह का पालन किया । और मई से मिट्टीदाह की प्रथा का प्रारंभ हुआ जो कि आज तक चली आ रही है।
गुजराती क्षत्रिय अग्निवंशी राजपूत समाज मैं केवल दो ही परिवार में मिट्टीदाह दिया जाता है। एक तो पानोला राजपूत वंश परिवार में और दूजा सोलंकी राजपूत वंश परिवार में सोलंकीयो ने समय के साथ दो - चार मिट्टीदाह दिए जिसके बाद में अग्निदाह चालू कर दिया और पानोला राजपूत वंश परिवार में यह प्रथा आज तक चली आ रही है।
यह चौहान की शाख पवैया से निकल कर पालनपरा और पानोला कहलाए । पाटन और जूनागढ़ से निकलकर दोनो भाई अपने इष्ट देवता पातालेश्वर महादेव की पूजा करने रुके जहां पर महादेव को फूलों की माला अर्पित की जाती है। मंदिर के आसपास फूल नहीं होने पर बड़े भाई फूल ढूंढने जंगल में निकल पड़े और छोटे भाई पान के पत्ते तोड़ लाए और नो पान के पत्तों की माला बनाकर पातालेश्वर महादेव को अर्पित की इसीलिए यह भाई पानोला कहलाए और बड़े भाई ने पूजा की विधि का पालन करा इसीलिए बड़े भाई पालनपरा कहलाए ।
फिर बड़े भाई ने वहीं पर रुक कर महादेव की पूजा अर्चना करने का निर्णय लिया और वहीं पर पालनपुर गांव बसाया जो पालन पर राजपूत कहलाए। और दूसरे भाई पान नौ लाएं ( 9 पान के पत्ते) इसीलिए वह पानोला कहलाए । और पालनपुर से निकल कर उन्होंने मध्यप्रदेश के मालवा की ओर प्रस्थान किया जहां पर उन्होंने । प्रथम खेड़ा गुजरात के अंदर गढ़ पाटन का निकास किया और वह से उठकर गांव कंजावानी और कुंडिया बसाया जो की झाबुआ जिले की तहसील राणापुर में कंजावनी है जहा पर इनकी सती माता की छतरी बनी हुई है । फिर बाद में कंजावनी का कुंडिया से उठकर उत्तर का गांव का धार का खेड़ा से गाव सेमलिया का खेड़ा बसाया और सेमलिया का खेड़ा से उठकर इनके पुत्रों ने अलग अलग गांवो में पड़ाव डाला सेमलिया का खेड़ा से उठकर एक भाई का वंश गांव तो मेवासा की बसीगत किया । और एक भाई का वंश उठकर गांव तो नामली की बसीगत किया। एक भाई का वंश गांव तो बरवाना (बोरवाणा ) और रानीगांव और शेरपुर की बसीगर किया ।
जब भारतवर्ष में चारों तरफ मार-काट मची थी, अशांति फैली हुई थी, कानून का कोई राज नहीं था, कोई चक्रवर्ती राजा नहीं बचा था, तब महर्षि वशिष्ठ नें महायज्ञ किया था। अग्नि की स्तुति करके सबसे पहले देवराज इंद्र की पूजा की। यज्ञ करते समय अग्नि में से तलवार लियें एक पराक्रमी निकला। वो परमार वंश का संस्थापक बना। उसके बाद भगवान विष्णु का आह्ववाहन किया गया तो उसमें से चौहान वंश का संस्थापक निकला। इसी तरह से भगवान शिव से सोलंकी और ब्रह्मा से प्रतिहारों की उत्पत्ति हुई।
इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी। इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी। आधुनिक इतिहासकार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल यज्ञ के बाद से तो मानते हैं लेकिन इस बात पर यकीन नहीं करते कि चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार अग्नि से उत्पन्न हुए हैं। इतिहासकार इस यज्ञ को एक तरह के शुद्धिकरण की तौर पर देखते है। पहली बात तो अगर हजारों साल पहले भगवान राम के समय में भी वशिष्ठ मुनि थे, तो वे क्या सैकड़ो साल तक वे जिंदा रहें इस यज्ञ को करने के लिये। इसका जबाब शायद ये है कि ऋषि मुनियों में गुरु-शिष्य पंरपरा चलती थी। एक ऋषि की मौत के बाद उसका एक शिष्य गुरु की गद्दी पर आसीन होता था और उसे भी अपनी गुरु की भांति वही नाम मिल जाता था। इतिहासकार, महर्षि वशिष्ठ के यज्ञ को मध्ययुग के नवी-दसवी काल में देखते है। ये वो समय था जब भारत में अरबों ने आक्रमण करना शुरु कर दिया था। गुप्तवंश के राजाओं और हर्षवर्धन के बाद पूरे देश में कोई पराक्रमी राजा ना बचा था। ये वही वक्त था जब महमूद गजनी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत को लूटता हुआ पश्चिमी मुहाने पर बने प्राचीन सोमनाथ मंदिर तक पहुंच गया था। उसने वहां लूटपाट और तबाही का वो मंजर खेला था कि आज भी लोग सुनकर सिहर उठते हैं। हिंदु समाज में लोगो की रक्षा करने वाले क्षत्रियों का पतन तेजी से हो रहा था। पहले वैश्य राजा (गुप्त वंश) और फिर हुण और शक राजाओं (उन्हें नीची जाति का माना जाता था) के हाथों सत्ता चले जाने से ब्राहमण और क्षत्रिय समाज परेशान था। शायद इसका ही नतीजा था अग्निकुल यज्ञ। इस यज्ञ के बाद पूरे उत्तर भारत में चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार वंश का ही राज हो गया।
चह्वान (चतुर्भुज)
अग्निवंश के सम्मेलन कर्ता ऋषि
१.वत्सम ऋषि,२.भार्गव ऋषि,३.अत्रि ऋषि,४.विश्वामित्र,५.चमन ऋषि
विभिन्न ऋषियों ने प्रकट होकर अग्नि में आहुति दी तो विभिन्न चार वंशों की उत्पत्ति हुयी जो इस इस प्रकार से है-
१.पाराशर ऋषि ने प्रकट होकर आहुति दी तो परिहार की उत्पत्ति हुयी (पाराशर गोत्र)
२.वशिष्ठ ऋषि की आहुति से परमार की उत्पत्ति हुयी (वशिष्ठ गोत्र)
३.भारद्वाज ऋषि ने आहुति दी तो सोलंकी की उत्पत्ति हुयी (भारद्वाज गोत्र)
४.वत्स ऋषि ने आहुति दी तो चतुर्भुज चौहान की उत्पत्ति हुयी (वत्स गोत्र)
चौहानों की उत्पत्ति आबू शिखर मे हुयी
दोहा-
चौहान को वंश उजागर है,जिन जन्म लियो धरि के भुज चारी,
बौद्ध मतों को विनास कियो और विप्रन को दिये वेद सुचारी










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